बेमेल मित्रता

 ऐसी मित्रता जो सिर्फ स्वार्थ पर टिकी हो वो बेमेल मित्रता है 

नदी के किनारे एक घना जंगल था। उस जंगल में एक चंचल खरगोश रहता था — नाम था चंपक। चंपक की आदत थी कि वह हर शाम नदी के किनारे बैठकर डूबते सूरज को निहारा करता था। उसकी आँखों में जिज्ञासा थी, मन में उत्साह था, और पैरों में फुर्ती — पर दिल में थोड़ी-सी अकेलेपन की|

उसी नदी में एक मगरमच्छ भी रहता था — मेकीमेकी का स्वभाव तो खाँटी शिकारी का था, पर अजीब बात यह थी कि वह भी हर शाम उसी पत्थर के पास तैरकर आ जाता जहाँ चंपक बैठता था।

 दोनों की नजरें मिलतीं, दोनों थोड़ी देर चुप रहते — और फिर बातें शुरू हो जाती। दूरी बनाए रखते हुए।धीरे-धीरे यह रोज़ का नियम बन गया। जंगल की बातें, आसमान के बादल, नदी की लहरें — इन सब पर दोनों घंटों बातें करते। चंपक उस दूरी को ही सुरक्षित समझता था, और मेकी उस आदत को अपनी मित्रता का प्रमाण मानने लगा था।

एक दिन मेकी ने धीरे से कहा:

"मित्र, तुम हमेशा इतनी दूर से बात क्यों करते हो? अब तो हम पक्के मित्र हैं। आओ न पास — मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बैठाकर पूरे तालाब की सैर करा सकता हूँ।"

चंपक मुस्कुराया, पर उसकी आँखें शांत रहीं। उसने कहा:

"मेकी भाई, मित्रता में निकटता ज़रूरी नहीं — समझ ज़रूरी है। जब हम यहाँ बैठकर इतनी अच्छी बातें कर सकते हैं, तो पास आने की क्या आवश्यकता? सच्ची मित्रता वह होती है जो दोनों को उनकी स्वाभाविक सीमाओं में सुरक्षित रखे। मैं नहीं चाहता कि कोई ऐसा क्षण आए जो हमारी मित्रता पर धब्बा लगा दे।"

मेकी उस दिन कुछ न बोला। पर चंपक के शब्द उसके मन में किसी काँटे की तरह चुभते रहे। कुछ दिन बाद एक सुबह मेकी को भोजन नहीं मिला। दोपहर हुई, तब भी नहीं। शाम ढलने लगी तो उसके पेट में ऐंठन होने लगी। भूख ने उसके भीतर उस पुराने शिकारी को जगा दिया जिसे मित्रता की चादर से दबाकर रखा था।

ठीक उसी समय चंपक हँसता-कूदता किनारे पर आ पहुँचा।

मेकी ने मन ही मन सोचा — "आज तो रहा नहीं जाता।" पर मुँह पर मित्रता का मुखौटा पहनकर उसने बड़े प्रेम से कहा:

"अरे चंपक मित्र! आज तो तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा। मेरी पत्नी कितने दिनों से कह रही हैं — अपने मित्र को एक बार घर ले आओ। आज कोई बहाना नहीं चलेगा!"




चंपक को पहले तो प्रसन्नता हुई। पर जैसे ही उसने मेकी की आँखों में झाँका — वह सिहर गया। वे आँखें मित्र की नहीं, शिकारी की थीं। और उन होठों के किनारे से टपकती लार — भूख की भाषा बोल रही थी।

चंपक के भीतर का चतुर दिमाग तुरंत सक्रिय हो गया।








उसने बड़े उत्साह से कहा:
"अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है मेकी भाई! पर सुनो — जब पहली बार भाभी से मिलने जाऊँगा तो खाली हाथ कैसे जाऊँ? माँ ने सिखाया है — पहली मुलाकात में कुछ न कुछ लेकर जाना चाहिए। जंगल में रोलीबेरी के पेड़ पर आज खूब फल लगे हैं — मैं अभी जाकर एक झोली भरकर लाता हूँ। तुम यहीं रुको — बस थोड़ी देर!"






और इससे पहले कि
मेकी 
कुछ कह पाता — चंपक वहाँ से 'ना दो, ग्यारह हो गया।'

जंगल में पहुँचकर चंपक एक ऊँचे पत्थर पर चढ़कर बैठ गया और लंबी साँस ली। उसकी आँखों में आँसू थे — पर मन में दृढ़ता भी। 

उसने सोचा:

"मैं जानता था... मैं हमेशा जानता था। इसीलिए मैंने कभी वह दूरी नहीं छोड़ी। मित्रता अच्छी चीज़ है — पर आँखें बंद करके नहीं।"

उस दिन के बाद चंपक ने नदी किनारे जाना बंद नहीं किया — पर मेकी की तरफ देखना बंद कर दिया। मेकी बहुत देर तक किनारे पर प्रतीक्षा करता रहा। पर चंपक लौटकर नहीं आया।

जंगल के बड़े-बुजुर्ग पेड़ों ने वह सब देखा था। उस रात हवा में एक संदेश गूँजा जो सुनने वालों के कानों में आज भी गूँजता है:

सीख

बेमेल मित्रता सदा धोखे का कारण बनती है। सच्ची मित्रता वह है जो स्वभाव, मूल्य और विश्वास पर टिकी हो — न केवल साथ बिताए पलों पर।

— Amit Mehrish


✦ समाप्त ✦

लेखक: अमित मेहरिश

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