बेमेल मित्रता
ऐसी मित्रता जो सिर्फ स्वार्थ पर टिकी हो वो बेमेल मित्रता है नदी के किनारे एक घना जंगल था। उस जंगल में एक चंचल खरगोश रहता था — नाम था चंपक। चंपक की आदत थी कि वह हर शाम नदी के किनारे बैठकर डूबते सूरज को निहारा करता था। उसकी आँखों में जिज्ञासा थी, मन में उत्साह था, और पैरों में फुर्ती — पर दिल में थोड़ी-सी अकेलेपन की| उसी नदी में एक मगरमच्छ भी रहता था — मेकी । मेकी का स्वभाव तो खाँटी शिकारी का था, पर अजीब बात यह थी कि वह भी हर शाम उसी पत्थर के पास तैरकर आ जाता जहाँ चंपक बैठता था। दोनों की नजरें मिलतीं, दोनों थोड़ी देर चुप रहते — और फिर बातें शुरू हो जाती। दूरी बनाए रखते हुए। धीरे-धीरे यह रोज़ का नियम बन गया। जंगल की बातें, आसमान के बादल, नदी की लहरें — इन सब पर दोनों घंटों बातें करते। चंपक उस दूरी को ही सुरक्षित समझता था, और मेकी उस आदत को अपनी मित्रता का प्रमाण मानने लगा था। एक दिन मेकी ने धीरे से कहा: "मित्र, तुम हमेशा इतनी दूर से बात क्यों करते हो? अब तो हम पक्के मित्र हैं। आओ न पास — मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बैठाकर पूरे तालाब की सैर करा सकता हूँ।" चंपक मु...